चौरासी राजपूत समाज के सभी सम्मानिये सदस्यों से निवेदन है कि हमारे गुरुजी श्री श्री 1008 श्री तुलसीदास जी महाराज, गुरुद्वारा धाम, बौंली का सदस्य बनने के लिए समाज की वेबसाईट पर ऑनलाइन आवेदन कर, सदस्यता में अपना नाम दर्ज करवाए।

संत शिरोमणी श्री श्री १००८ श्री तुलसीदास जी महाराज गुरुद्वारा धाम, बौंली द्वारा सन, १४५२ में राजपूत समाज को निम्नलिखित नियमो से कंठी में बाँधा था-

  • 1. ड्योढ़ी पर्दा दूर कर दिया
  • 2. देश भास की राव चलाई
  • 3. बेटी का पैसा नहीं लेना
  • 4. बहु का झगड़ा नहीं लेना
  • 5. देवर के भौजाई पल्ले नहीं लगेगी
  • 6. कुंवारे के नाते कुटुंब (कबीला) में नहीं बैठेगी
  • 7. बैल वादी नहीं कराना
  • 8. मदिरा – मांस का सेवन नहीं करना
  • 9. राह – चलते कच्ची रोटी नहीं खाना
  • 10. मृतक को (उल्टा) जन्म अवस्था/दण्डवत अवस्था में दाह संस्कार

महात्मा श्री तुलसीदास से क्रमशः गद्दी का कुर्सीनामा

  • 1. पूज्यनीय श्री महात्मा तुलसीदास जी सम्वत 1448 में गद्दी पर विराजे
  • 2. पूज्यनीय श्री महात्मा किशनदास जी सम्वत 1538 में गद्दी पर विराजे
  • 3. पूज्यनीय श्री महात्मा रामदास जी सम्वत 1668 में गद्दी पर विराजे
  • 4. पूज्यनीय श्री महात्मा अमरदास जी सम्वत 1709 में गद्दी पर विराजे
  • 5. पूज्यनीय श्री महात्मा प्रीतमदास जी सम्वत 1994 में गद्दी पर विराजे
  • 6. पूज्यनीय श्री महात्मा सेवादास जी सम्वत 2039 में गद्दी पर विराजे

श्री तुलसीदास जी महाराज की आरती

जय गुरुदेव दयानिधि दीनन हितकारी।
जय जय मोह विनाशक, भव बंधन हारी ।।

ब्रह्मा विष्णु, सदाशिव, गुरु मूरतधारी।
वेद पुराण बखानत, गुरु महिमा धारी।। जय।।

जप तप तीरथ संयम दान विविध दीन्हे।
गुरु बिन ज्ञान न होवे, कोटि यतन कीन्हे।। जय।।

माया मोह नदी जल जीव बजे सारे।
नम जहाज बिठाकर, गुरु पल में तारे।। जय।।

काम, क्रोध, मद मत्सर चोर बड़े भारे।
ज्ञान खडग दे कर में, गुरु संहारे ।। जय।।

नाना पथ जगत में निज निज गुण गावे।
सबका सार बताकर गुरु मारग लावे।। जय।।

गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी।
वचन सुनत तम नाशे, सब संशय टारी।। जय।।

तन, मन, धन सब अर्पण, गुरु चरणन कीजे।
ब्रह्मानंद परमपद, मोक्ष गति लीजे।। जय।।

चार वेद छ: शास्त्र सब में दर्शाया।
शेष, महेश रटत है, पार नहीं पाया।। जय।।

पंच चोर के मारण कारण, नाम का बाण दिया।
प्रेम भक्ति से साधा, भव जल पर किया।। जय।।

सतयुग, त्रेता, द्वापर नाना रूप लिया।
कलिकाल भक्तन हित, हंस अवतार लिया।। जय।।

श्री तुलसीदास महाराज की आरती प्रेम सहित गावे।
भव सागर से तरकर परम गति पावे।। जय।।

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