गुरु हमारी आस्था है विश्वास है ज्ञान है भक्ति है गुरु विचार करने का विषय नहीं है। गुरु अनुसरण करने योग्य होता है। व्यक्ति हो गाँव-शहर राज्य हो या मानव समाज हो वो यदि सद्गुरु के नियमों पर चलता है गुरु पूजा करता है तो वह निश्चित ही उन्नति की ओर अग्रसर होता है।
व्यक्ति गुरु के ज्ञान से ही स्वंय का समाज का एवं समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करता है। गुरु का ज्ञान और आशीर्वाद ही मानव को निष्काम कर्म करने परमार्थ कार्य करने की प्रेरणा देता है। हम सभी राजपूतों का परम सौभाग्य है कि ऐसे ही हमारे गुरु देव श्री तुलसीदास जी महाराज है। जिनकी असीम अनुकम्पा एवं आशीर्वाद हमारे क्षत्रिय राजपूत समाज को मिला है।
आज से लगभग 840 वर्ष पूर्व से ये राजपूत समाज 84 कबीला दरबड़ वाले तुलसीदास जी महाराज गुरुदेव के नियमों का पालन करता चला आ रहा है। लगभग 845 वर्ष पूर्व हमारा समाज पूर्वी भारत में निवास किया करता था। तत्कालीन समय में भारत में मुगलों का राज्य काफी फ़ैल चुका था। उसी काल चक्र में हिन्दू मुस्लिम शासको में साम्रराज्य विस्तार की लड़ाइयां चल रही थी।
ये राजपूत समाज 84 कबीला 840 वर्ष पूर्व राजस्थान राज्य के रणतभँवरगढ़ जिसे आज रणथम्भौर कहा जाता है में आने से पूर्व भारत के पूर्वी भाग उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव जिला के डौंडिया खेड़ा नामक स्थान पर निवास किया करते थे। यह भाग चंद्र गुप्त मौर्य काल में पांचाल प्रान्त का हिस्सा हुआ करता था। जिसकी राजधानी डौड़िया खेड़ा हुआ करती थी।
जम्मूद्वीप आर्यव्रत भारत खंडे राजस्थान प्रान्त के सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणतभंवरगढ़ (रणथम्भोर) एक ऐतिहासिक किला है। जिसने जीवनकाल में कई क्रूर मुस्लिम शासको के प्रहारों को झेला है। रणतभंवरगढ़ पर विक्रम संवत 1226 में इलतुतमीश ने 1236 में रजिया सुलतान ने 1248 से 1258 तक बलवन ने 1290 से 1292 तक जलालुदीन ने आक्रमण किये तथा संवत 1301 में अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया तत्कालीन समय में रणतभंवरगढ़ के राजा हम्मीर चौहान (चाहयमान) का शासन काल था। जिसने विक्रम संवत 1299 में मंगोल से आये कुछ विद्रोही सैनिकों को अपना कर्तव्य समझ कर शरण दे दी थी। जो अलाउद्दीन खिलजी के दुश्मन थे । जिससे नाराज होकर बदले की भावना से राजा हम्मीर पर आक्रमण कर दिया। विक्रम सवंत 1301 में हम्मीर के युद्ध हारने के बाद उनकी रानी रंगा देवी ने कई क्षत्राणीयों सहित पदमला तालाब में कूद कर जल जौहर किया था जो इतिहास का पहला जल जौहर कहलाता है। तब से एक कहावत आज तक चली आ रही है
सिंह सुवन सत्य पुरुष वचन कदली फले इक बार ।
तिरिया तेल हमीर हठ चढ़े न दूजी बार ।।
विक्रम संवत 1240 में डौंडिया खेड़ा से महरब के नवाब के साथ 16 उमराव 84 कबीला के 700 डोला राजपूत सैनिक हिन्दूपत बादशाह अलाउद्दीन खिलजी की सहायता के लिए युद्ध लड़ने आये रनतभवंरगढ़ राजा के खिलाफ। तब राजपूत सैनिकों को बताया गया कि यह युद्ध मुस्लिम शासक के खिलाफ लड़ा जाएगा।
चंद्रबरदाई लिखते है कि परशुरामजी द्वारा क्षत्रियों का सम्पूर्ण विनाश के बाद ब्राहणों ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया था जिसकी अग्नि से चौहान परमार गुर्जर प्रतिहार व सोलंकी राजपूत उत्पन्न हुए।
राजपूत वंशावली–
दस रवि से दस चंद्र से बारह क्षत्रिज प्रमाण
चार हुतासन सोलए कुल छत्तीस वंश प्रमाण ।
भौमवाश से धाकरे टांक नाग उनमान
चौहानी चौबीस बांटी कुल बासठ वंश प्रमाण। ।
जब राजपूत जाती का विशलेषण करते है तो चौहान वंश की चोबीस शाखाओ में पाविया व पुरबिया नामक दो शाखाए भी आती है जो कि चौहान वंश की शाखाओं में वर्णित है।
इतिहास में कुछ जगह प्रमाण मिलता है कि पुरबिया कोई जाति सूचक शब्द नहीं है। भारत के मध्यकालिन युग जो 476 से 1450 ईस्वी तक कहलाता है।भारत में राजपूत और ब्राह्मणों के भाड़े के सैनिकों और पूर्वि गंगा के मैदानों के सैनिकों के लिए स्तेमाल किया जाने वाला एक सामान्य शब्द था जो वर्तमान पश्चिमी बिहार और पूर्वि उत्तर प्रदेश के अनुरूप क्षेत्र है ।
विक्रम संवत 1240 में राजस्थान प्रान्त में आने के बाद हमारे पूर्वज अलाउद्दीन खिलजी के झूठे बचनों में आकर युद्ध लड़े। विक्रम सवंत 1301 के लगभग जब हमारे पूर्वज रणथम्भोर आक्रमण के लिए आये तब 700 डोला जो 84 कबीला 16 उमराव थे और जब पता कला कि हारने वाला हिन्दू शासक चौहान वंशी हम्मीर थे तो बड़ा पछतावा हुआ और अलाउद्दीन से विद्रोह करके वहां से चले गए और अलग अलग सैनिक टुकड़ियों में विभाजित होकर शेरपुर खिलचीपुर बौंली भगवतगढ़ और आन्दोली में जाकर बस गए ।
उस समय मुश्लिम शासकों की क्रूरता का दौर था। विद्रोह के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सभी विद्रोही सैनिकों को मारने का आदेश दे दिया। तब सभी राजपूत सैनिकों ने आत्मरक्षा के लिए अपनी पहचान छिपाकर पुर्विया शब्द को जाती के रूप में स्तेमाल किया। लगभग 150 वर्षों तक हमारा समाज ऐसे ही चलता रहा। जैसे जैसे परिवार बढ़ते गए उसी तरह गांवों की संख्या भी बढ़ती रही। लेकिन हमारी पहचान पुर्विया के नाम से चलती रही। तब से यही स्थाई रूप से रहने लग गए तो कुछ रीति रिवाज परम्परा आर्थिक सामाजिक धार्मिक समरूपता की व एक गुरु की आवश्यकता की महसुस होने लगी।
विक्रम सवंत 1452 में ग्राम बौली में रामशाला नामक जगह पर डकार वाले बाबा एक सिद्ध संत श्री तुलसीदास महाराज रहा करते थे। श्री तुलसीदास जी महाराज दास धाम दास सम्प्रदाय के बड़े सिद्ध बड़े ज्ञानी पहुंचे हुए संत थे। महाराज ने भक्ति से कई शक्ति अर्जित कर रखी थी। आज भी हमारे 84 राजपूत समाज अपने आपको शौभाग्य शाली मानता है कि हमारे पूर्वजों ने महान संत श्री तुलसीदास जी महाराज को विक्रम संवत 1452 में गुरु के रूप में माना।
संत श्री तुलसीदास जी महाराज को समाज के गुरु के बनाने के पिछे एक किम्बवदन्ति प्रचलित थी एक समय की बात है कि एक व्यक्ति ने अपनी गलती से अपनी पुत्री का विवाह एक युवक के साथ करने का वचन दे दिया1 कुछ समय बाद उस व्यक्ति ने उस युवक के पिता को भी अपनी पुत्री का विवाह चावल के रूप में शगुन देवगन पक्का कर दिया1 तय समय के अनुसार दोनों दुल्ले बरात लेकर कन्या के पिता के घर पहुंचे तो कन्या के पिता चिंचित हो गए कि मेरे पास तो एक कन्या है1 दो दुल्लोहों का विवाह कैसे संपन्न होगा1 वचन वद्ध कन्या के पिता श्री तुलसीदास जी महाराज के पास पहुंचे और सारा वृतांत सुनाया1 ऐसे में श्री तुलसीदास जी महाराज ने कन्या के पिता को आश्वासन दिया कि आप चिंतित ना होवे और वे कन्या के घर चले गए1 श्री तुलसीदास जी महाराज ने अपनी सिद्ध शक्तियों से हुब हुब एक ओर कन्या बना दी1 इस तरह दोनों दुल्लाहों को दुल्हन मिल गई और विवाह समपन्न हो गया1
इस आश्चर्य चकित घटना से प्रभावित होकर हमारे 84 राजपूत समाज ने विक्रम संवत 1452 में संत श्री श्री 1008 श्री तुलसीदास जी महाराज को गुरु के रूप में स्वीकार किया1 गुरु रूप स्वीकार करने पर गुरुदेव संत श्री श्री 1008 श्री तुलसीदास जी महाराज ने तत्कालीन समय में व्याप्त कुरीतियों व दोषों को दूर करने का निर्णय लिया और 84 राजपूत समाज से कहा की गुरु दक्षिणा परम्परानुसार गुरु दक्षिणा में मेरे द्वारा बनाये गए नियमों पर चलने का वचन लूंगा व समाज को पितृ दोष से भी मुक्त कर दूँगा1 समाज के उत्थान व शिष्यों की युक्ति के लिए गुरुदेव श्री श्री 1008 श्री तुलसीदास जी महाराज ने 10 गुरुमंत्र दिया और गुरु दक्षिणा में इन 10 नियमों का जीवन भर पालन करने का वचन लिया1 तब से लेकर आज भी हमारा 84 राजपूत समाज गुरु जी द्वारा बनाये गए 10 नियमों को कंठी के रूप में अपना रहा है1
विक्रम सम्वत 1452 के बाद इस जगह का नाम गुरुद्वारा धाम श्री तुलसीदास जी महाराज रामशाला चौक प्रचलन में आ गया1 आज भी गुरुद्वारा धाम में श्री श्री 1008 श्री तुलसीदास जी महाराज की कास्ट खड़ाऊ धरोहर के रूप में पूजा स्थल पर गुरुदेव की उपस्थिति साकार करती है और समाज का गुरु रूप में मार्गदर्शन कर रही है1
84 राजपूत समाज निम्नलिखित परगनाओं से भी जाना जाता हैं –
1 बौंली परगना
2 शहर परगना
3 श्रीजी परगना
4 नागदा परगना
5 हाड़ौती परगना
6 लवाण परगना
7 जयपुर परगना
पुरे भारत खंड में सिर्फ हमारा 84 राजपूत समाज ही एक ऐसा समाज है जो पितृ दोष से मुक्त है1 यदि कन्ही पितृ दोष है तो किसी न किसी रूप में गुरूजी के नियमों का पालन नहीं हो रहा है1 गुरूजी के अनुयाई नहीं हैं या गुरू मन्त्र से विमुख है1
84 राजपूत अपने पथ से विमखु ना हो आदि को मध्य नजर रखते हुए तथा गुरुद्वारा धाम का अधूरा निर्माण को पूरा करने के लिए समाज ने 03 जुलाई 2023 गुरुपूर्णिमा पर आम सहमति से एक कार्यकारणी का गठन किया। इस कार्यकारणी ने 03 नवम्बर 2023 को एक समिति-
श्री राजपूत समाज गुरुद्वारा धाम एवं श्री तुरलसीदास जी महाराज सेवा समिति रामशाला चौक बौली
का गठन कर इसे सोसाइटी एक्ट 1958 के तहत रजिस्टर्ड करा दिया।
समिति का मुख्य उदेश्य गुरु परम्परा को आगे बढ़ाना व संगठित समाज रखना रहेगा।
समिति नियमों के अनुसार समिति कार्यकारणी का कार्य काल दो वर्ष रहेगा। प्रत्येक दो वर्ष बाद समाज गुरुपूर्णिमा पर कार्यकारणी का सर्वसम्मति से चुनाव करेगा। कार्यकारणी समिति के बनाये नियमों अनुसार कार्य करती रहेगी।
जय गुरुदेव श्री श्री १००८ श्री तुलसीदास जी महाराज की जय
